नई दिल्ली। अयोध्या ढांचा विध्वंस मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित कई अन्य नेताओं पर आपराधिक साजिश का मुकदमा चलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस मामले पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।
बता दें कि सीबीआई ने भाजपा और वीएचपी के वरिष्ठ नेताओं पर आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने गत छह अप्रैल को सभी पक्षों की दलीलें सुन कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
छह अप्रैल को फैसला सुरक्षित रखते समय कोर्ट ने अयोध्या मे ढांचा ढहने के मुकदमें की सुनवाई 25 साल से लंबित होने पर चिंता जताते हुए अपने टिप्पणी में कहा था कि मामले की रोजाना सुनवाई कर दो साल में निपटाना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने आडवाणी, जोशी समेत अन्य नेताओं का मुकदमा रायबरेली की अदालत से लखनऊ की अदालत स्थानांतरित करने और संयुक्त आरोपपत्र के आधार पर एक साथ मुकदमा चलाने के भी संकेत दिये थे।
इस मामले में सीबीआई ने एसएलपी दाखिल कर ढांचा ढहने के मामले में तकनीकी आधार पर आरोपमुक्त हो गये नेताओं पर आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाए जाने की मांग की है। सीबीआई ने हाईकोर्ट के 20 मई 2010 के आदेश को चुनौती दी है। जिसमें हाईकोर्ट ने 21 नेताओं को आरोपमुक्त कर दिया था। इनमें से आडवाणी जोशी सहित 8 नेताओं पर रायबरेली की अदालत में मुकदमा चल रहा है लेकिन उसमें साजिश के आरोप नहीं हैं। बाकी के 13 लोग पूरी तरह छूट गए थे। 13 में 7 की मृत्यु हो चुकी है। बचे लोगों में कल्याण सिंह प्रमुख हैं जो ढांचा ढहने के समय प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और इस समय राजस्थान के राज्यपाल हैं। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पीसी घोष व न्यायमूर्ति आरएफ नारिमन की पीठ ने की थी। बहस के दौरान पक्षकारों की ओर से निम्न दलीलें दी गईं थीं।
सीबीआई की दलील
सीबीआई ने आरोपमुक्त हुए 21 लोगों पर साजिश में मुकदमा चलाने की मांग करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने ये कह कर तकनीकी आधार पर आरोप निरस्त किये थे कि एफआइआर संख्या 198 (8 नेताओं का मामला) को रायबरेली से लखनऊ ट्रांसफर करने की अधिसूचना के समय हाईकोर्ट से अनुमति नहीं ली गई। लेकिन हाईकोर्ट ने ये भी कहा था कि प्रथमदृष्टया अभियुक्तों पर मामला बनता है। उसने संयुक्त आरोपपत्र को भी ठीक कहा था। सीबीआई ने कहा कि नेताओं पर रायबरेली में वापस मुकदमा चलने लगा लेकिन वहां उन पर साजिश के आरोप नहीं हैं। परन्तु बाकी 13 तो पूरी तरह छूट गए उन पर कहीं मुकदमा नहीं चल रहा।
नेताओं की दलील
नेताओं के वकील ने कहा कि मुकदमा रायबरेली से लखनऊ स्थानांतरित नहीं हो सकता न ही उन पर साजिश का केस चलाया जा सकता है। कोर्ट अनुच्छेद 142 की शक्तियों का इस्तेमाल करके भी ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि इससे उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है। अगर मुकदमा लखनऊ स्थानांतरित हुआ तो रोजाना सुनवाई के बावजूद 2 साल मे नहीं निपटेगा क्योंकि नये सिरे से सुनवाई होगी और 800 गवाहों से जिरह होगी। सीबीआई के पास अगर साजिश के सबूत हैं तो वो रायबरेली में पूरक आरोपपत्र दाखिल कर सकती है। साथ ही कहा था कि असलम भूरे केस में कोर्ट का फैसला अंतिम हो चुका है जिसमें कोर्ट ने रायबरेली में मुकदमा चलाने की बात कही है। ये फैसला सभी पर बाध्यकारी है।


